योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और वैवाहिक सुख-शांति के लिए कन्याओं द्वारा किया जाने वाला पावन व्रत
जुलाई महीने में गुजरात की परंपराओं में एक खास धार्मिक उल्लास देखने को मिलता है। इस समय दो महत्वपूर्ण उपवास शुरू होते हैं – गौरी व्रत और जया पार्वती व्रत। ये दोनों व्रत मुख्यतः अविवाहित कन्याओं द्वारा किए जाते हैं, और इनका उद्देश्य होता है एक उत्तम वर की प्राप्ति तथा सुखद वैवाहिक जीवन की कामना।

कब से शुरू होंगे व्रत?
गौरी व्रत 2025
• आरंभ: रविवार, 6 जुलाई 2025
• समापन: गुरुवार, 10 जुलाई 2025
• उपवास अवधि: 5 दिन
• तिथि अनुसार: आषाढ़ शुक्ल एकादशी से पर्णिमा तक
जया पार्वती व्रत 2025
• आरंभ: मंगलवार, 8 जुलाई 2025
• समापन: रविवार, 13 जुलाई 2025 (रात जागरण के साथ)
• व्रत खुलने की तिथि: 14 जुलाई 2025 की सुबह
• तिथि अनुसार: आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से
गौरी व्रत की परंपरा और पूजा विधि
• यह व्रत मां गौरी (पार्वती) को समर्पित होता है।
• 5 दिन तक कन्याएं जमीन पर सोती हैं और बिना नमक-मसाले का सादा भोजन करती हैं।
• पूजा में मिट्टी या धातु की गौरी प्रतिमा की स्थापना की जाती है।
• व्रत के दौरान जवारा (बीज रोपण) भी किया जाता है, जिसे प्रतिदिन जल अर्पित किया जाता है।
• प्रतिदिन व्रत कथा का पाठ किया जाता है और अंत में विशेष पूजा के साथ समापन होता है।
• व्रत समाप्ति के दिन सामूहिक भोजन और पूजन के बाद व्रती कन्याओं को विदाई दी जाती है।
जया पार्वती व्रत की विशेषताएं
• इसमें भी कन्याएं जवारा (बीज) बोती हैं और रोज़ जल चढ़ाती हैं।
• हाथ में नागला (लाल-सफेद धागा) बांधा जाता है, जो सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
• रोजाना मां पार्वती की पूजा और कथा वाचन होता है।
• अंतिम दिन रात्रि जागरण की परंपरा निभाई जाती है जिसमें भजन और पूजा होती है।
• अगले दिन सुबह पूजा के बाद व्रत खोला जाता है।
गौरी व्रत और जया पार्वती व्रत में क्या है अंतर?
गौरी व्रत और जया पार्वती व्रत, दोनों ही अविवाहित कन्याओं द्वारा किए जाने वाले अत्यंत पावन उपवास हैं, लेकिन इनके स्वरूप और परंपराओं में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।
गौरी व्रत इस वर्ष 6 जुलाई 2025 से शुरू होकर 10 जुलाई को समाप्त होगा। यह व्रत मुख्य रूप से अविवाहित कन्याएं रखती हैं और इसका उद्देश्य होता है — उत्तम जीवनसाथी की प्राप्ति। इस व्रत के दौरान व्रती सादा भोजन करती हैं, नमक-मसालों का त्याग करती हैं, और जमीन पर सोकर, संयमित जीवन जीती हैं। पूजा में मां गौरी की प्रतिमा स्थापित कर प्रतिदिन कथा और आरती की जाती है।
वहीं दूसरी ओर, जया पार्वती व्रत 8 जुलाई 2025 से आरंभ होकर 13 जुलाई की रात जागरण के साथ संपन्न होगा, और व्रत 14 जुलाई की सुबह खोला जाएगा। यह व्रत मुख्य रूप से अविवाहित कन्याओं द्वारा ही किया जाता है, हालांकि कुछ स्थानों पर विवाहित महिलाएं भी इसे करती हैं। इसका उद्देश्य सिर्फ उत्तम वर की प्राप्ति ही नहीं, बल्कि पति की दीर्घायु और पारिवारिक सुख-शांति की भी कामना होता है। इस व्रत की प्रमुख परंपराओं में बीज रोपण (जवारा उगाना), नागला बांधना, और अंतिम रात को जागरण करना शामिल हैं।
इस तरह, दोनों व्रतों का उद्देश्य भले ही समान प्रतीत हो, लेकिन उनकी पूजा पद्धति, समापन प्रक्रिया और सांस्कृतिक विधियाँ उन्हें अलग पहचान देती हैं।
धार्मिक मान्यता
दोनों व्रतों की कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण कन्या ने मां पार्वती की तपस्या कर शिव जैसे वर की प्राप्ति की थी। तभी से यह व्रत कन्याओं में प्रचलित हुआ। जया पार्वती व्रत में विशेष रूप से जागरण कर मां को प्रसन्न किया जाता है।
निष्कर्ष
गौरी व्रत और जया पार्वती व्रत सिर्फ उपवास नहीं हैं, बल्कि ये श्रद्धा, आत्मसंयम और संस्कृति से जुड़ने का माध्यम हैं। इन व्रतों के ज़रिए नई पीढ़ी भी भारतीय परंपराओं को आत्मसात कर रही है।